Wednesday, May 27, 2020

श्री शिव चालीसा (Shree Shiva Chalisa)


श्री शिव चालीसा 

- : दोहा : -

श्री गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान। कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

चालीसा


जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥ 1
भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥ 2 
अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन छार लगाये॥ 3 
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देख नाग मुनि मोहे॥ 4
मैना मातु की ह्वै दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥ 5 
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥ 6
नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥ 7
कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥ 8
देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥ 9
किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥ 10
तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥ 11
आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥ 12 
त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥ 13
किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तसु पुरारी॥ 14
दानिन महं तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥ 15
वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥ 16
प्रगट उदधि मंथन में ज्वाला। जरे सुरासुर भये विहाला॥ 17
कीन्ह दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥ 18
पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥ 19
सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥ 20
एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥ 21
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भये प्रसन्न दिए इच्छित वर॥ 22
जय जय जय अनंत अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥ 23
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै । भ्रमत रहे मोहि चैन न आवै॥ 24
त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। यहि अवसर मोहि आन उबारो॥ 25
लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥ 26
मातु पिता भ्राता सब कोई। संकट में पूछत नहिं कोई॥ 27
स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु अब संकट भारी॥ 28
धन निर्धन को देत सदाहीं। जो कोई जांचे वो फल पाहीं॥ 29
अस्तुति केहि विधि करौं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥ 30
शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥ 31
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। नारद शारद शीश नवावैं॥ 32
नमो नमो जय नमो शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥ 33
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पार होत है शम्भु सहाई॥ 34
ॠनिया जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥ 35
पुत्र हीन कर इच्छा कोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥ 36
पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे ॥ 37
त्रयोदशी ब्रत करे हमेशा। तन नहीं ताके रहे कलेशा॥ 38
धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥ 39
जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्तवास शिवपुर में पावे॥ 40

कहे अयोध्या आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

--: दोहा :--

नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा। तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥
मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान। अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

अवसर (Chance)


अवसर 

एक बार एक ग्राहक चित्रो की दुकान पर गया । उसने वहाँ पर अजीब से चित्र देखे । पहले चित्र मे चेहरा पूरी तरह बालो से ढँका हुआ था और पैरोँ मे पंख थे ।एक दूसरे चित्र मे सिर पीछे से गंजा था।
ग्राहक ने पूछा – यह चित्र किसका है?
दुकानदार ने कहा – अवसर का ।
ग्राहक ने पूछा – इसका चेहरा बालो से ढका क्यो है?
दुकानदार ने कहा -क्योंकि अक्सर जब अवसर आता है तो मनुष्य उसे पहचानता नही है ।
ग्राहक ने पूछा – और इसके पैरो मे पंख क्यो है?
दुकानदार ने कहा – वह इसलिये कि यह तुरंत वापस भाग जाता है, यदि इसका उपयोग न हो तो यह तुरंत उड़ जाता है ।
ग्राहक ने पूछा – और यह दूसरे चित्र मे पीछे से गंजा सिर किसका है?
दुकानदार ने कहा – यह भी अवसर का है । यदि अवसर को सामने से ही बालो से पकड़ लेँगे तो वह आपका है ।अगर आपने उसे थोड़ी देरी से पकड़ने की कोशिश की तो पीछे का गंजा सिर हाथ आयेगा और वो फिसलकर निकल जायेगा । वह ग्राहक इन चित्रो का रहस्य जानकर हैरान था पर अब वह बात समझ चुका था ।
दोस्तो,
आपने कई बार दूसरो को ये कहते हुए सुना होगा या खुद भी कहा होगा कि ‘हमे अवसर ही नही मिला’ लेकिन ये अपनी जिम्मेदारी से भागने और अपनी गलती को छुपाने का बस एक बहाना है । Real मे भगवान ने हमे ढेरो अवसरो के बीच जन्म दिया है । अवसर हमेशा हमारे सामने से आते जाते रहते है पर हम उसे पहचान नही पाते या पहचानने मे देर कर देते है । और कई बार हम सिर्फ इसलिये चूक जाते है क्योकि हम बड़े अवसर के ताक मे रहते हैं । पर अवसर बड़ा या छोटा नही होता है । हमे
हर अवसर का भरपूर उपयोग करना चाहिये ।

बोले हुए शब्द वापस नहीं आते (Spoken words do not return)

बोले हुए शब्द वापस नहीं आते

एक बार एक किसान ने अपने पडोसी को भला बुरा कह दिया, पर जब बाद में उसे अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह एक संत के पास गया.उसने संत से अपने शब्द वापस लेने का उपाय पूछा.
संत ने किसान से कहा , ” तुम खूब सारे पंख इकठ्ठा कर लो , और उन्हें शहर के बीचो-बीच जाकर रख दो .” किसान ने ऐसा ही किया और फिर संत के पास पहुंच गया.
तब संत ने कहा , ” अब जाओ और उन पंखों को इकठ्ठा कर के वापस ले आओ”
किसान वापस गया पर तब तक सारे पंख हवा से इधर-उधर उड़ चुके थे. और किसान खाली हाथ संत के पास पहुंचा. तब संत ने उससे कहा कि ठीक ऐसा ही तुम्हारे द्वारा कहे गए शब्दों के साथ होता है,तुम आसानी से इन्हें अपने मुख से निकाल तो सकते हो पर चाह कर भी वापस नहीं ले सकते.

Introduction, Microphone, Speech, Ceo, Woman, Audio

गायत्री मंत्र - अर्थ सहित ( Gayatri Mantra )


गायत्री मंत्र - अर्थ सहित 

ब्रह्मनाद 

ॐ SSSSS
ॐ SSSSS
ॐ SSSSS


गायत्री मंत्र मीनिंग इन हिंदी
..........
उस प्राण स्वरूप दुःखनाशक, सुख स्वरूप, 
श्रेष्ठ तेजस्वी, पापनाशक, देव स्वरूप, 
परमात्मा को हम अंतरात्मा में धारण करें। 
वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करें । 
***********
तूने हमें उत्पन्न किया पालन कर रहा है तू । 
तुझसे ही पाते प्राण हम, दुखियों के कष्ट हरता है तू । 
तेरा महान तेज है, छाया हुआ सभी स्थान । 
सृष्टि की वस्तु-वस्तु में, तू हो रहा है विद्यमान । 
तेरा ही धरते ध्यान हम, माँगते तेरी दया । 
ईश्वर हमारी बुद्धि को, श्रेष्ठ मार्ग पर चला । 

शान्ति पाठ (Shanti Path) - Mantra

शान्ति पाठ :


ओ उ म द्यौः शान्तिः अन्तरिछ (ग्वं) शान्तिः 

पृथिवी शान्तिः आपः शान्तिः ओषधयः शान्तिः।
वनस्पतयः शान्तिः विश्वेदेवा शान्तिः ब्रहा शान्तिः सर्व  
(ग्वं) शान्तिः, 
शान्तिरेव शान्तिः, सा मा शान्ति रेधि ।।
ओउम् शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।
                                     
 (यजुर्वेद)

श्री गणेश वंदना ( Shree Ganesh Vandana)


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।। श्री गणेश वंदना ।।


गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बू फल चारु भक्षणम् ।
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर पादपंकजम् ।।
वर्णानामर्थ संधानाम् रसानाम् छन्दसामपि ।
मंगलानाम् च कर्तारौ वाणीविनायकौ ।।
.......

स्रोत- हरि दर्शन आरती संग्रह

प्रातः स्मरण मंत्र (Pratah Smaran Mantra)

प्रातः स्मरण मंत्र


कराग्रे वसते लक्ष्मी: करमध्ये सरस्वती । 
करमूले तु गोविन्द: प्रभाते करदर्शनम ।। 

समुद्रवसने देवि! पर्वतस्तन मण्डले । 
विष्णुपत्नि! नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व मे ।। 

ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी, भानुशशि - भूमिसुतो बुधश् च । 
गुरुश् च शुक्रः शनि-राहु-केतव:, कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ।। 
सनत्कुमारः सनकः सनन्दनः सनातानोsपयासुरि पिङ्गलाै च। 
सप्त स्वरा: सप्त रसातलानि, कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ।। 
सप्तार्णवाः सप्त कुलाचलाश् च  सप्तर्षयाे द्वीपवनानि सप्त ।
भूरादि कृत्वा भुवनानि सप्त कुर्वन्त सर्वे मम सुप्रभातम ।।
पृथ्वी सगन्धा सरसास्तथापः स्पर्शी च वायुज्र्वलनं च  तेजः।
नभः सशब्दं महता सहैव कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्राभातम् ।।
प्रातः समरणमेतघो विदित्वाSSनारतंः पठेत् ।
सः सम्यक् धर्मनिष्ठःस्यात संस्मृताsखण्ड भारत ।।

Attainment of God प्रभु की प्राप्ति !!

एक राजा था। वह बहुत न्याय प्रिय तथा प्रजा वत्सल एवं धार्मिक स्वभाव का था। वह नित्य अपने ईष्ट देव की बडी श्रद्धा से पूजा-पाठ और याद करता था।
प्रभु की प्राप्ति !!

एक दिन ईष्ट देव ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिये तथा कहा --
"राजन् मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। बोलो तुम्हारी कोई इछा हॆ?"
प्रजा को चाहने वाला राजा बोला --
"भगवन् मेरे पास आपका दिया सब कुछ हैं ।आपकी कृपा से राज्य मे सब प्रकार सुख-शान्ति है । फिर भी मेरी एक ही ईच्छा   हैं कि जैसे आपने मुझे दर्शन देकर धन्य किया, वैसे ही मेरी सारी प्रजा को भी कृपा कर दर्शन दीजिये।"
"यह तो सम्भव नहीं है" -- ऐसा कहते हुए भगवान ने राजा को समझाया ।
परन्तु प्रजा को चाहने वाला राजा भगवान् से जिद्द् करने लगा ।
आखिर भगवान को अपने साधक के सामने झुकना पडा ओर वे बोले --
"ठीक है, कल अपनी सारी प्रजा को उस पहाड़ी के पास ले आना और मैं पहाडी के ऊपर से सभी को दर्शन दूँगा ।"
ये सुन कर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुअा और भगवान को धन्यवाद दिया ।
अगले दिन सारे नगर मे ढिंढोरा पिटवा दिया कि कल सभी पहाड़ के नीचे मेरे साथ पहुँचे, वहाँ भगवान् आप सबको दर्शन देगें।
दूसरे दिन राजा अपने समस्त प्रजा और स्वजनों को साथ लेकर पहाडी की ओर चलने लगा।
चलते-चलते रास्ते मे एक स्थान पर तांबे के सिक्कों का पहाड देखा। प्रजा में से कुछ एक लोग उस ओर भागने लगे । तभी ज्ञानी राजा ने सबको सर्तक किया कि कोई उस ओर ध्यान न दे,क्योकि तुम सब भगवान से मिलने जा रहे हो,
इन तांबे के सिक्कों के पीछे अपने भाग्य को लात मत मारो ।
परन्तु लोभ-लालच मे वशीभूत प्रजा के कुछ एक लोग तो तांबे की सिक्कों वाली पहाड़ी की ओर भाग ही गये और सिक्कों कि गठरी बनाकर अपने घर कि ओर चलने लगे। वे मन ही मन सोच रहे थे, पहले ये सिक्कों को समेट ले, भगवान से तो फिर कभी मिल ही लेगे ।
राजा खिन्न मन से आगे बढे । कुछ दूर चलने पर चांदी के सिक्कों का चमचमाता पहाड़ दिखाई दिया । इस वार भी बचे हुये प्रजा में से कुछ लोग, उस ओर भागने लगे और चांदी के सिक्कों की गठरी बनाकर अपनी घर की ओर चलने लगे।
उनके मन मे विचार चल रहा था कि ऐसा मौका बार-बार नहीं मिलता है । चांदी के इतने सारे सिक्के फिर मिले न मिले, भगवान तो फिर कभी मिल ही जायेगें ।
इसी प्रकार कुछ दूर और चलने पर सोने के सिक्कों का पहाड़ नजर आया।अब तो प्रजा जनो में बचे हुये सारे लोग तथा राजा के स्वजन भी उस ओर भागने लगे।वे भी दूसरों की तरह सिक्कों कि गठरियां लाद-लाद कर अपने-अपने घरों की ओर चल दिये ।
अब केवल राजा और रानी ही शेष रह गये थे । राजा रानी से कहने लगे --
"देखो कितने लोभी ये लोग । भगवान से मिलने का महत्व ही नहीं जानते हैं।
भगवान के सामने सारी दुनियां की दौलत क्या चीज हैं..?"
सही बात है -- रानी ने राजा की बात का समर्थन किया और वह आगे बढने लगे।
कुछ दूर चलने पर राजा और रानी ने देखा कि सप्तरंगि आभा बिखेरता हीरों का पहाड़ हैं । अब तो रानी से भी रहा नहीं गया, हीरों के आर्कषण से वह भी दौड पडी और हीरों की गठरी बनाने लगी। फिर भी उसका मन नहीं भरा तो साड़ी के पल्लू मेँ भी बांधने लगी । वजन के कारण रानी के वस्त्र देह से अलग हो गये,
परंतु हीरों की तृष्णा अभी भी नहीं मिटी। यह देख राजा को अत्यन्त ही ग्लानि और विरक्ति हुई । बड़े दुःखद मन से राजा अकेले ही आगे बढते गये ।
वहाँ सचमुच भगवान खड़े उसका इन्तजार कर रहे थे । राजा को देखते ही भगवान मुसकुराये और पूछा -- "कहाँ है तुम्हारी प्रजा और तुम्हारे प्रियजन ।
मैं तो कब से उनसे मिलने के लिये बेकरारी से उनका इन्तजार कर रहा हूॅ ।"
राजा ने शर्म और आत्म-ग्लानि से अपना सर झुका दिया । तब भगवान ने राजा को समझाया --
"राजन, जो लोग अपने जीवन में भौतिक सांसारिक प्राप्ति को मुझसे अधिक मानते हैं, उन्हें कदाचित मेरी प्राप्ति नहीं होती और वह मेरे स्नेह तथा कृपा से भी वंचित रह जाते हैं..!!"
सार..
जो जीव अपनी मन, बुद्धि और आत्मा से भगवान की शरण में जाते हैं, और
सर्व लौकिक सम्बधों को छोडके प्रभु को ही अपना मानते हैं वो ही भगवान के प्रिय बनते हैं..!!
( लेखक : अज्ञात )

आरती श्री हनुमान जी की





आरती श्री हनुमान जी की

आरती कीजै हनुमान लला की।  
दुष्टदलन रघुनाथ कला की ।।
जाके बल से गिरीवर काँपै । 
रोग-दोष जाके निकट न झाँके ।।
अंजनि पुत्र महा बलदाई । 
संतन के प्रभु सदा सहाई ।।
दे बीरा रघुनाथ पठाये ।
लंका जारि सिया सुधि लाये ।।
लंका सी कोट समुद्र-सी खाई ।
जात पवनसुत बार न लाई ।।
लंका जारि असुर संहारे ।
सियाराम जी के काज संवारे ।।
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे ।
आनि सजीवन प्रान उबारे ।।
पैठि पाताल तोरि जम कारे ।
अहिरावण की भुजा उखारे ।।
बायें भुजा असुर दल मारे ।
दाहिने भुजासंतजन तारे ।।
सुर नर मुनि आरती उतारे ।
जै जै जै हनुमान उचारे ।।
कंचन थार कपूर लौ छाई । 
आरती करत अंजना माई ।। 
जो हनुमान (जी) की आरती गावै ।
बसि बैकुंठ परम पद पावै ।।
लंका विध्वंस किए रघुराई ।
तुलसी दास प्रभु कीरति गाई ।।
ईति आरती बजरंग बली की । 
आरती कीजे हनुमान लला की ।।

हो जाओ तैयार साथियों हो जाओ तैयार


हो जाओ तैयार साथियों हो जाओ तैयार

हो जाओ तैयार साथियों, हो जाओ तैयार । 
अर्पित कर दो निज तन-मन, मांग रहा बलिदान वतन ।
अगर देश के काम ना आये, तो जीवन बेकार ।।1।। हो.....
सोच-सोच में समय गया, उठो, लिखो इतिहास नया 
बंसी फेंको और उठा लो हाथों में तलवार ।।2।। हो....
तूफानी गति रुके नहीं, शीश कटे पर झुके नहीं । 
उठे हुए माथे के सम्मुख ठहर न पाती हार ।।3।। हो....
गूँज उठे धरती-अंबर, और उठा लो ऊँचा स्वर ।
काटी-कोठी कंठों से गूंजे भारत की जय जयकार ।।4।। हो ..

#Desh_Bhakti_Geet, 

पापी कौन ? (Who is the sinner?)

पापी कौन

एक राजा ब्राह्मणों को लंगर में महल के आँगन में भोजन करा रहा था। राजा का रसोईया खुले आँगन में भोजन पका रहा था। उसी समय एक चील अपने पंजे में एक जिंदा साँप को लेकर राजा के महल के उपर से गुजरी। पँजों में दबे साँप ने अपनी आत्म-रक्षा में चील से बचने के लिए अपने फन से जहर निकाला। रसोईया जो लंगर ब्राह्मणों के लिए पका रहा था, उस लंगर में साँप के मुख से निकली जहर की कुछ बूँदें खाने में गिर गई। किसी को कुछ पता नहीं चला। फल-स्वरूप वह ब्राह्मण जो भोजन करने आये थे उन सब की जहरीला खाना खाते ही मौत हो गयी। अब जब राजा को सारे ब्राह्मणों की मृत्यु का पता चला तो ब्रह्म-हत्या होने से उसे बहुत दु:ख हुआ।
ऐसे में अब ऊपर बैठे यमराज के लिए भी यह फैसला लेना मुश्किल हो गया कि इस पाप-कर्म का फल किसके खाते में जायेगा ?

1. राजा - जिसको पता ही नहीं था कि खाना जहरीला हो गया है।
2. रसोईया - जिसको पता ही नहीं था कि खाना बनाते समय वह जहरीला हो गया है।
3. वह चील - जो जहरीला साँप लिए राजा के ऊपर से गुजरी।
4. वह साँप - जिसने अपनी आत्म-रक्षा में जहर निकाला था।

बहुत दिनों तक यह मामला यमराज की फाईल में अटका रहा। 
एक दिन कुछ ब्राह्मण राजा से मिलने उस राज्य मे आए और उन्होंने किसी महिला से महल का रास्ता पूछा। उस महिला ने महल का रास्ता तो बता दिया पर रास्ता बताने के साथ-साथ ब्राह्मणों से ये भी कह दिया कि, "देखो भाई ! जरा ध्यान रखना, वह राजा आप जैसे ब्राह्मणों को खाने में जहर देकर मार देता है।"

जैसे ही उस महिला ने ये शब्द कहे, उसी समय यमराज ने फैसला ले लिया कि उन मृत ब्राह्मणों की मृत्यु के पाप का फल इस महिला के खाते में जाएगा और इसे उस पाप का फल भुगतना होगा। यमराज के दूतों ने पूछा - "प्रभु ऐसा क्यों ? जबकि उन मृत ब्राह्मणों की हत्या में उस महिला की कोई भूमिका भी नहीं थी।"

तब यमराज ने कहा - "भाई देखो ! जब कोई व्यक्ति पाप करता हैं तब उसे बड़ा आनन्द मिलता हैं। पर उन मृत ब्राह्मणों की हत्या से ना तो राजा को आनन्द मिला, ना ही उस रसोइया को आनन्द मिला, ना ही उस साँप को आनन्द मिला और ना ही उस चील को आनन्द मिला। पर उस पाप-कर्म की घटना को बुराई करने के भाव से बखान कर उस महिला को जरूर आनन्द मिला। इसलिये राजा के उस अनजाने पाप-कर्म का फल अब इस महिला के खाते में जायेगा।"

बस इसी घटना के तहत आज तक जब भी कोई व्यक्ति जब किसी दूसरे के पाप-कर्म का बखान बुरे भाव से करता हैं तब उस व्यक्ति के पापों का हिस्सा उस बुराई करने वाले के खाते में भी डाल दिया जाता है।
अक्सर हम जीवन में सोचते हैं कि हमने जीवन में ऐसा कोई पाप नहीं किया, फिर भी हमारे जीवन में इतना कष्ट क्यों आया ? ये कष्ट और कहीं से नहीं, बल्कि लोगों की बुराई करने के कारण उनके पाप-कर्मो से आया होता हैं जो बुराई करते ही हमारे खाते में ट्रांसफर हो जाता हैं।
"जय सदगुरू देव